गणपति बप्पा की दसवीं सदी की कुछ दुर्लभ मूर्तियां:ये हैं नृत्य करते आठ भुजाओं वाले गणपति और मोदक खाते बप्पा की 1 हजार साल पुरानी प्रतिमा

गणेशोत्सव आज से शुरू हो रहा है। शहर में विराजने वाले गणपति बप्पा के अलावा आप संस्कृति विभाग परिसर में संचालित महंत घासीदास म्यूजियम में गणेश जी की 1 हजार साल पुरानी प्रतिमाओं के दर्शन भी कर सकते हैं। यहां बारसूर के जुड़वां गणेश की प्रतिमा, नृत्य करते अष्टभुजाओं वाले गणपति और आसनस्थ लम्बोदर गणेश की सैकड़ों साल पुरानी प्रतिमाएं और रेप्लिका मौजूद हैं। यही नहीं, कैलाश पर्वत पर विराजमान उमा महेश्वर के चरणों के पास बैठे गणेश और कार्तिकेय की दुर्लभ मूर्ति के दर्शन भी यहां कर सकते हैं। इनमें से तीन मूर्तियां कारीतलाई जबलपुर से मिली हैं। छुटि्टयों की वजह से म्यूजियम अब सोमवार को ओपन होगा। यहां सुबह 10 से शाम 5 बजे तक विजिट कर सकते हैं।

8 में से 6 भुजाएं हैं खंडित
ये है नृत्य गणपति। कारीतलाई, जबलपुर से मिली 10वीं सदी की इस प्रतिमा में गणेश जी नृत्य मुद्रा में हैं। उनके उदर में यज्ञोपवीत है। गले में हार, हाथ में कंकण और भुजाओं में भुजबंध दृष्टव्य है। ये प्रतिमा अष्टभुजी है, जिनमें से 6 भुजाएं खंडित हैं। सूंड का हिस्सा और कान भी खंडित है।

बारसूर गणेश

छिंदक नागवंशियों की राजधानी के रूप में बारसूर पहचाना जाता था। ये मंदिर जगदलपुर से 100 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इस मंदिर में गणेश जी की दो विशालकाय मूर्ति हैं। एक पांच फीट और दूसरी सात फीट की। संग्रहालय में इन्हीं मूर्तियों की प्रतिकृति के दर्शन कर सकते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण राजा बाणासुर ने करवाया था। राजा की पुत्री और उसकी सहेली दोनों भगवान गणेश की पूजा करती थी। लेकिन इस इलाके में दूर तक गणेश मंदिर नहीं था, ऐसे में राजा की पुत्री को गणेश जी की आराधना के लिए दूर जाना पड़ता था। राजा ने अपनी पुत्री के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया था।

शिव-पार्वती के साथ गणेश और कार्तिकेय

ये है उमा महेश्वर। 10वीं सदी की ये प्रतिमा कारीतलाई, जबलपुर से मिली है। बलुआ पत्थर की इस प्रतिमा में शिव चतुर्भुजी रूप में हैं किंतु माता पार्वती के दो हाथ हैं। शिवजी के ऊपरी दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं में सर्प है। उमा महेश्वर कैलाश पर्वत पर विराजमान हैं। निचले हिस्से में एक ओर गणेश और दूसरी ओर कार्तिकेय हैं। कैलाश पर्वत उठाने का प्रयास करते रावण की झलक भी मूर्ति में देख सकते हैं।

चतुर्भुजी गणेश के बाएं कंधे पर हैं नाग, सूप जैसे हैं कान, हाथ मेंं है मोदक

10वीं सदी ईसवी की ये प्रतिमा कारीतलाई जबलपुर से मिली है। आसनस्थ लम्बोदर गणेश के बाएं कंधे पर नाग है। सिर पर मुकुट और गले में हार है। सूंड का हिस्सा खंडित है। उनके कान सूप के समान बड़े हैं। चतुर्भुजी गणेश के ऊपर के दाहिने हाथ में मोदक है। दोनों बाएं हाथ और दाईं ओर का निचला हाथ खंडित है।

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