गणेश मूर्ति बनाने लिए थे एडवांस, ऑर्डर नहीं मिला तो अब पैसा लौटाने के लिए मूर्तिकार संपत्ति रख रहे गिरवी

भिलाई.  | तीन पीढ़ियों से बप्पा की मूर्ति बनाकर अपना जीवनयापन कर रहे थनौद गांव के मूर्तिकारों पर इस बार कोरोनावायरस विघ्न बनकर आया है। हर साल 2 हजार से अधिक गणेश की मूर्ति बनाने वाले थनौद गांव के मूर्तिकारों को एक भी ऑर्डर नहीं मिला है। दुर्ग-भिलाई, रायपुर, राजनांदगांव की गणेशोत्सव समितियों ने पिछले साल जो एडवांस देकर मूर्ति बनाने के पैसे दिए थे, उसे अब लौटाने के लिए मूर्तिकार लोन ले रहे हैं। क्योंकि सारे ऑर्डर इस साल कैंसिल हो चुके हैं। गांव में एक भी बड़ी प्रतिमा नहीं बन रही है। मूर्तिकारों के पास एडवांस के पैसे लौटाने के लिए भी कुछ नहीं बचा। अब हालत यह है कि गांव के अधिकतर मूर्तिकारों ने अपनी जमीन-जायदाद को गिरवी रखकर 8 प्रतिशत ब्याज पर लोन ले रखा है। ताकि समितियों को एडवांस रकम लौटा सकें।
सबसे बड़े राधे आर्ट गैलरी ने लिया 5 लाख रुपए लोन
थनौद गांव के सबसे बड़े मूर्तिकार राधे आर्ट गैलरी के संचालक राधेश्याम चक्रधारी हर साल 100 बड़ी मूर्तियां बनाते हैं। पिछले साल एडवांस के मिले पैसे से मूर्ति बनाने वाले मजदूरों को सैलरी और अन्य खर्चों में खत्म हो गए। कोरोना के कारण इस बार सभी ने ऑर्डर कैंसिल किए तो उनको पैसे वापस करने की समस्या सामने आई। जब कुछ नहीं बचा तो उन्होंने निजी बैंक से 8 प्रतिशत ब्याज पर 5 लाख रुपए लोन लिया। जिसमें कुछ पर्सनल लोन और कुछ जमीन और खेत के कागज पर लोन लिया।

गणेशजी को मूषक से बचाने की भी चिंता
एडवांस के बाद बड़े मूर्तिकारों ने मूर्ति बनाने का काम तो शुरू कर दिया था। 60 से 70 प्रतिशत काम पूरे भी हो गए। लेकिन ऑर्डर कैंसिल होने से अब इन मूर्तियों के मेंटेनेंस में भी पैसा लग रहा है। लोन लिए पैसे से ही मजदूरों को सैलरी देने के बाद मूर्तियों को मूषक से बचाने दवा का छिड़काव रोज करना पड़ रहा है। अब एक साल तक मूषक (चूहे) से गणेशजी की प्रतिमा को बचाने की चुनौती होगी।
मूर्तिकार करने लगे कारखानों में मजदूरी, कुछ ने शुरू की खेती-किसानी
थनौद गांव के मूर्तिकारों के सामने कोरोना काल में घर चलाने की चुनौती भी है। क्योंकि इस गांव का मूल काम ही मूर्ति बनाना है। इसके अलावा कोई काम नहीं। लेकिन अब मूर्तिकार पेट पालने के लिए कारखानों में मजदूरी करने निकल पड़े हैं तो वहीं कुछ खेती किसानी में लग गए हैं। सबका कहना है कि कम से कम किसी तरह खुद का और परिवार का पेट पाल सके।
छत्तीसगढ़ समेत पड़ोसी राज्यों में जाती है थनौद की बनी मूर्तियां
भिलाई से 25 किमी दूरी पर स्थित शिल्पग्राम थनौद की आबादी करीब तीन हजार है। पूरे गांव का मुख्य पेशा मिट्टी के गणेश बनाना है। 40 साल पहले थनौद में मूर्तियां बनाने का काम शुरू हुआ था। यहां की मूर्तियों की मांग छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र समेत पांच राज्यों में रहती है। महाराष्ट्र से कुछ युवा मूर्तिकला सीखने भी थनौद आते हैं। लेकिन इस लॉकडाउन के कारण बाहर से कोई भी मूर्ति बनाना सीखने नहीं पहुंचे। यहां करीब 300 ऐसे लोग मूर्ति के काम में जुड़े हैं जो इस गांव के नहीं है। उन्हें यहां रोजगार का अवसर मिला है।

लॉकडाउन में खत्म हो गए एडवांस के पैसे
भास्कर की टीम शनिवार को थनौद गांव पहुंची। सामने में ही मूर्ति बनाने वाले टेंट खाली पड़े थे। अंदर जाने के बाद कुछ मूर्तिकार मूर्ति बना रहे थे। उनसे इस साल के आर्डर के बारे में पूछने पर उनका कहना था कि ऑर्डर तो दूर की बात है, इस साल घर कैसे चलाएं इसकी चिंता है। एडवांस के पैसे लेकर लॉकडाउन में घर चलाने और मूर्तियों की लागत पर खर्च तो कर दिया लेकिन अब लौटाने लोन लेना पड़ रहा है।
गांव का करीब हर मूर्तिकार कर्ज में: मूर्तिकार लव चक्रधारी ने बताया कि इस बार कोरोना ने उनकी 3 पीढ़ी की कमाई को हिलाकर रख दिया है। मूर्ति बनाकर ही अपनी जिंदगी गुजारने वाले मूर्तिकार अब कर्ज में डूब चुके हैं। गांव में लगभग हर बड़ी मूर्ति बनाने वाले मूर्तिकारों ने निजी बैंकों से लोन लिया है।

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