एक बेटे का मां को खत :कोरोना और क्वारैंटाइन के बीच एक मां-बेटे के रिश्ते को नई राह मिली; जीने के लिए बेटे ने मां से दूरी बनाई, पर रिश्ते के दरवाजे खुले रखे

  • कोरोना में खास बात यह है कि अजनबियों से ही नहीं, हमें अपने करीबियों से भी सावधानी के तौर पर जरूरी दूरी बनाकर रखनी है
  • कोई परफेक्ट नहीं होता, मां भी नहीं थीं, लेकिन उन्होंने अपना बेहतर देने की कोशिश की

क्रिश्चियन रॉबिन्सन. वैक्सीन नहीं आने तक कोरोनावायरस से बचने का सबसे सरल उपाय सोशल डिस्टेंसिंग को माना जा रहा है। ऐसे में इस महामारी ने लोगों को एक-दूसरे से दूर कर दिया है। हाल जो भी हो कम से कम दो मीटर का दूरी तो हमारे बीच आ ही गई है। खास बात यह है कि अजनबियों से ही नहीं, हमें अपने करीबियों से भी सावधानी के तौर पर जरूरी दूरी बनाकर रखनी है। हालांकि इसे बुरे दौर के कुछ सुखद पहलू भी हैं। जानिए कैसे कोरोना और क्वारैंटाइन के दौरान एक मां-बेटे के रिश्ते को नई राह मिली।

  • मां, जो कभी हमारी खुशी में शरीक नहीं हुईं

महामारी से काफी पहले से मैं एक व्यक्ति से खुद को दूर रख रहा था। वह थी मेरी मां। हमारा रिश्ता हमेशा दूरी का रहा। मेरे बचपन के दौर में वो काफी वक्त तक जेल में रहीं। हर पार्टी या छुट्टियों की किसी तस्वीर में वो नहीं हैं। बंद न होने पर भी वे लत और मानसिक स्वास्थ्य से जूझ रहीं थीं और दूरी बनाकर रखती थीं। मैं और मेरा भाई भाग्यशाली थे कि हमारे पास दादी थीं, जो हमारा ध्यान रखती थीं और हमारी बुनियाद थीं।

  • मां के साथ रिश्ते का वो वक्त जब लगा की दूरी बनाए रखना जरूरी है

व्यस्क होने के दौरान मैं इस बात पर संघर्ष करता था कि मां से किस तरह का रिश्ता रखूं। मैंने जीने और बचने के लिए दूरी को अपनाया। मेरे पूरे परिवार ने उनकी मदद करने के लिए कई कोशिशें की, लेकिन हमने सीखा कि किसी को कुछ भी देना बहुत मुश्किल है, जब वे प्राप्त करना ही नहीं चाहते या पा नहीं सकते। आखिरी बार मैंने सुना था कि मेरी मां लॉस एंजिलिस के स्किड रो में रह रहीं थीं। 

क्वारैंटाइन स्लो डाउन ने मुझे हरकत करने के लिए समय दिया और यह पहचानने का वक्त दिया कि मेरे पास उस तरह के उपाय नहीं है, जिस तरह की मदद की मां को जरूरत है। मैं कभी भी हमारे रिश्ते के दरवाजे को पूरी तरह से बंद नहीं करूंगा। हालांकि मैं जानता हूं कि मैं उन्हें तब तक अंदर नहीं आने दे सकता जब तक कि वो मेरे तरफ से तैयार की गई मर्यादाओं का सम्मान करें। लेकिन तब तक मेरे अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए मैं जानता हूं कि मुझे दूरी बनाकर रखनी होगी।

  • कोई परफेक्ट नहीं होता, मां भी नहीं थीं

बड़े होकर मैंने मां की गैरमौजूदगी के बाद उन्हें बहुत प्यार किया। जब मैं 8 साल का था तो वो जेल से बाहर आईं थीं और खुद को साथ लाने की कोशिश कर रही थीं। उन्होंने मुझसे कहा कि वो मेरे साथ दिन बिताना चाहती हैं और जो भी मैं चाहूं हम सबकुछ कर सकतै हैं।

मैंने हाल ही में रिलीज हुई "द लॉयन किंग" देखना चुना। बच्चे इस फिल्म के बारे में स्कूल में बात कर रहे थे और मैं इसमें फिट होने के लिए प्लॉट जानने का नाटक कर रहा था। यह सबसे जादूई दोपहर थी। थियेटर काफी खूबसूरत था। फिल्म के बाद एक एग्जीबिशन था, जिसमें बताया जा रहा था कि यह फिल्में कौन बनाता है। उस पल में पहली बार पता लगा कि जो फिल्में मुझे पसंद हैं उन्हें वो लोग बनाते हैं जो ड्रॉ कर सकते हैं और शायद एक दिन मैं भी वो बन सकता हूं जो बड़ा होकर ड्रॉ करे और जीने के लिए कहानियां बताए।

क्वारैंटाइन के इस स्लोडाउन ने मुझे रुकने, हरकत करने, प्रोत्साहित करने का समय दिया कि मैं कहां हूं और यहां कैसे पहुंचा। मुझे महसूस होता है कि मैं उस दर्द पर ध्यान देने में अटक गया कि मेरी मां क्या उपलब्ध कराने में असमर्थ थीं। मां भी इंसान हैं। लोग परफेक्ट नहीं होते। वे अपनी समझ से अपना बेहतरीन देते हैं।

  • अगर मैं खुद का आदर करूंगा तो मेरे अंदर रह रहे मां के हिस्से का भी सम्मान होगा

जब भी मैं अपनी मां के प्रति गुस्सा या निर्णय की भावना को महसूस करता हूं तो मैं उन्हें बच्चे की तरह देखने की कोशिश करता हूं। एक मेरे जैसा बच्चा जिसने दर्द को महसूस किया है और आपने आसपास की दुनिया की दया पर जी रही थीं। मैं जानता हूं कि दूरियां केवल लोगों के बीच ही नहीं होती, बल्कि लोगों में भी होती है। मेरी मां ने अपने जीवन को खुद के दर्द से खुद को दूर करते हुए बिताया है।

मैं अपनी मां को सबसे अच्छी मां होने के लिए धन्यवाद देता हूं, जैसे वो बनना जानती थीं। मैं खुद को वैसा प्यार, ध्यान और देखभाल देकर उनका सम्मान करूंगा, जैसा मैं चाहता था कि वह मुझे दें। खुद को प्यार करने से, खुद के साथ अच्छा रहने से, खुद को सम्मान देने से, मैं अपने अंदर मौजूद उनके हिस्से को भी सम्मानित कर रहा हूं। यह उनके दिए दर्द को भूलने या सही मानने को लेकर नहीं है, बल्कि यह खुद को उस दर्द से आजाद करने को लेकर है जो मुझे कैदी बनाता है।

  • बेहतर होगा यादों से निजात पाएं और आजादी चुनें

यह वो हिस्सा है जहां मुझे आपको बताना चाहिए कि माफ करो और भूलो मत। मैं ऐसा नहीं करने वाला हूं। इसके बजाए मैं आपसे इस फूल को काटने के लिए कहूंगा। कल्पना कीजिए कि इसमें वह अनुभव है, जिसने आपको दर्द दिया। इसे कहीं और रख दें। शायद बटुए या जेब में। यह फूल टूट जाएगा, मुरझा जाएगा, अलग हो जाएगा। आपको बंदी बनाने वाले दर्द, यादों का भी यही हाल हो। यह आपको आजादी के रास्ते पर मदद करें।

(क्रिश्चियन रॉबिन्सन लेखक हैं और बच्चों के लिए पुस्तकों के इलस्ट्रेटर हैं।)

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