जर्मनी के डॉक्टरों का दावा :कोविड 19 से उबरने के बाद शरीर में कम हो रही एंटीबॉडीज की संख्या, दूसरी बार भी संक्रमित हो सकते हैं मरीज

SARS-CoV-2 से दूसरी बार संक्रमण मुमकिन है तो एक्सपर्ट्स सोशल डिस्टेंसिंग में ढील और कथित इम्युनिटी पासपोर्ट पर भी सवाल उठा रहे हैं।
  • एंटीबॉडीज शरीर में दूसरी बार आए किसी वायरस की पहचान कर उन्हें सेल के अंदर जाने से रोकती हैं
  • चीन में हुई एक स्टडी में ही ऐसा ही दावा- कोविड 19 मरीज के खून में लंबे समय एंटीबॉडीज नहीं रहती हैं

फराह अकील. कोरोनावायरस को लेकर एक और चौंकाने वाली खोज सामने आई है। जर्मनी के म्यूनिख अस्पताल में हुई एक जांच में पाया गया है कि मरीजों के शरीर में एंटीबॉडीज की संख्या कम होती जा रही है। ये नतीजे चीन में हुई ऐसी ही एक अन्य जांच से मेल भी खाती हैं।

दरअसल, चीन में हुई स्टडी में भी सामने आया था कि कोविड 19 के मरीजों में एंटीबॉडीज बनी नहीं रहती हैं। हालांकि अभी इसमें और रिसर्च की जरूरत है, लेकिन शुरुआती परिणाम बताते हैं कि दूसरी बार इंफेक्शन होना भी संभव है। अगर ऐसा है तो यह सोशल डिस्टेंसिंग को संभालने के तरीके को भी बदल सकती है।

आमतौर पर वायरल इंफेक्शन से उबर रहे लोग में इम्यून रिस्पॉन्स होता था और बीमारी के खिलाफ सुरक्षा देता था। इसका मतलब है इम्यून सिस्टम ने एंटीबॉडीज बना ली हैं जो बीमारी से लड़ेंगी। अगर बीमारी शरीर पर दूसरी बार हमला करती है तो यह एंटीबॉडीज वायरस की पहचान करती हैं और यह जानती हैं कि इससे कैसे निपटना है।

चीफ फिजीशियन क्लीमेंस वेंडनर जनवरी 2020 के अंत में ठीक होने वाले कोविड 19 मरीजों में इम्युनिटी की जांच कर रहे हैं। इन टेस्ट में खास तौर पर एंटीबॉडीज की संख्या में कमी नजर आई। क्लीमेंस ने कहा कि दो से तीन महीनों के दौरान टेस्ट किए गए 9 में से 4 मरीजों में वायरल अटैक को रोकने वाली न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज का स्तर कम हुआ है। 

क्या होती है लॉन्ग टर्म इम्युनिटी?
हमारा शरीर वायरस से निपटने के लिए एंटीबॉडीज बनाकर इम्युनिटी तैयार करता है। एंटीबॉडीज प्रोटीन्स होते हैं, जिन्हें बी सेल्स प्रोड्यूस करते हैं। अगर वायरस शरीर में दूसरी बार पहुंचता है तो न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज वायरस को पकड़ लेती हैं और सेल में जाने से रोकती हैं। इससे इंफेक्शन रुक जाता है।

एंटीबॉडीज कई तरह की होती हैं

  • IgM: यह पहले बनने वाली एंटीबॉडी होती है और इनका होना इंफेक्शन के होने को बताता है। जैसे ही संक्रमण खत्म होता है, IgM एंटीबॉडीज सड़ जाती हैं और इनका बाद में पता नहीं लग पाता।
  • IgG: IgM एंटीबॉडीज के सड़ जाने के बाद IgG एंटीबॉडीज बनती हैं जो खून में महीनों तक रहती हैं। IgG का होना पिछले संक्रमण और इम्युनिटी के होने को दर्शाता है।

बी सेल मेच्योर होते हैं और बोन मैरो में रहने वाले प्लाज्मा सेल्स बनाते हैं। यहां ये संक्रमण के खिलाफ एंटीबॉडीज तैयार करते हैं। यह प्लाज्मा सालों तक रहकर हमें इम्यून रख सकते हैं।

कोविड 19 मरीजों में एंटीबॉडी टेस्टिंग

  • SARS-CoV-2 इंफेक्शन का पता करने के कई तरीके हैं। एक तरीका है पीसीआर टेस्ट जो जैनेटिक मटेरियल को कैप्चर कर वायरस के होने या न होने के संकेत देता है। 
  • दूसरे टेस्ट्स का मकसद एंटीबॉडीज बनाना है। ये टेस्ट इंफेक्शन के बारे में अप्रत्यक्ष जानकारी देते हैं। एंटी IgM पॉजिटिव टेस्ट वर्तमान संक्रमण के संकेत देता है, जबकि एंटी IgG पॉजिटिव टेस्ट सुधार और इम्युनिटी को दर्शाता है। मास एंटीबॉडी टेस्टिंग जरूरी है क्योंकि यह समुदाय के इम्युनिटी स्टेटस की जानकारी देती है।
  • एंटीबॉडी टेस्ट से कोविड 19 के हल्के या बिना लक्षणों वाले मामलों का पता लग सकता है। जैसा की स्टडी से पता चला है अगर SARS-CoV-2 एंटीबॉडीज खून में हमेशा नहीं रहती। ऐसे में उबर चुके मरीजों को भी फिर से संक्रमित होने का खतरा है।

वायरस को फैलने से रोकने का एक तरीका "हर्ड इम्युनिटी" है
कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि हम कोविड 19 को लेकर हर्ड इम्युनिटी तक तब पहुंच सकते हैं, जब 60 फीसदी जनसंख्या नोवल कोरोनावायरस के मामले में इम्यून हो। अभी तक एक्सपर्ट्स आंकड़ा तय नहीं कर पाए हैं। क्योंकि कुछ वायरस के मामले में हर्ड इम्युनिटी को पाने के लिए 90 प्रतिशन पॉपुलेशन में इम्युनिटी डेवलप होने की जरूरत होती है।

सवाल सोशल डिस्टेंसिग पर
हर्ड इम्युनिटी का फायदा साफ है कि हम लोग काम पर वापस जा सकेंगे और सामाजिक गतिविधियां शुरू हो सकेंगी। अब जब SARS-CoV-2 से दूसरी बार संक्रमण मुमकिन है तो एक्सपर्ट्स सोशल डिस्टेंसिंग में ढील और कथित इम्युनिटी पासपोर्ट पर सवाल उठा रहे हैं। 

बिना लक्षण वाले मरीजों में ज्यादा तेजी से कम होती हैं एंटीबॉडीज
कई सारे वायरल इंफेक्शन्स के साथ एंटीबॉडी का आकार इंफेक्शन से जुड़ा होता है और SARS-CoV-2 कोई अलग नहीं है। साइंटिफिक जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित एक चीनी स्टडी बताती है कि बिना लक्षण वाले मरीजों का इम्यून रिस्पॉन्स बहुत कमजोर होता है और गंभीर रूप से बीमार मरीजों की तुलना में एसिम्पटोमैटिक मरीज ज्यादा तेजी से एंटीबॉडीज खोते हैं। 

स्टडी ने 37 लक्षण और इतने ही बिना लक्षण वाले SARS-CoV-2 के मरीजों पर फोकस किया। इसके लेखकों ने कहा कि दोनों समूहों के 90% से ज्यादा लोगों में न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज का कम होना देखा गया। शोधकर्ताओं ने प्रभाव पता करने के लिए मरीजों के शरीर से एंटीबॉडीज निकालीं। शोधकर्ताओं ने 175 मरीजों की एंटीबॉडीज को टेस्ट किया और पाया कि लगभग सभी ने सेल को वायरल इंफेक्शन से बचाया है।

यह टेस्ट लैब में किए गए थे। SARS-CoV-2 एंटीबॉडीज इतना ही प्रभावकारी शरीर के अंदर हैं या नहीं। अभी तक वैज्ञानिक इन एंटीबॉडी के गिरते स्तर के कारण का पता नहीं लगा पाए हैं। तुलना की जाए तो दूसरे कोरोनावायरस के मामलों में एंटीबॉडीज खून में एक साल तक रहती हैं।

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